आचार्य भगवंत श्री रजनीश ने अपने प्रवचनमे एक सुंदर बात कही थी,
''च्वांगत्सु नाम का एक झेन साधु था । वह हंमेशा बहुत खुश रहता था । कभी कीसीने उसको उदास नही देखा था । वह हंमेशा ही हंसता-गाता और खुशमिजाज ही दिखाई पडता था । पर एक दिन वह सुबह सुबह जागा तो बहुत उदास हो गया ! उनके शिष्यों को बडा आश्रर्य हुआ । सब मिलकर पूछने लगे गुरु को, कि ऐसी क्या बात हुई ? क्या प्रश्न खडा हुआ जो आप ईतने उदास हो गये ? श्वांगत्सुने कहा की प्रश्न बहुत कठीन पैदा हुआ है, मै कबसे सोच रहा हु पर कोई हल नही मिल रहा ! शिष्यने कहा ऐसा कौन सा प्रश्न है जीसका आपके पास भी उत्तर नही ? श्वांगत्सु ने बताया कि आज रात जब मै सोया था तो निंदमे मै एक सपना देख रहा था, सपने मे मै एक तितली बन गया था और फूल फूल पर बडे मजे से उड रहा था ! तो शिष्यने कहा कि फिर ईसमे प्रश्न क्या है ? वह तो एक सपना ही तो था , और बडा अच्छा सपना था ईसमे कठीनाई की बात तो नही थी !
श्वांगत्सु ने कहा कठीनाई तब नही थी, कठीनाई की बात अब है, प्रश्न अब खडा हुआ है, कि; सच यह है कि वो था ? श्वांगत्सु का तितली होना स्वप्न था कि तितली का अब श्वांगत्सु हो जाना स्वप्न है ?
क्या ऐसा नही हो सकता कि एक तितली को स्वप्न आया हो और वह श्वांगत्सु बन कर यहां तुम्हारे बीच घुम रहा हो ?''
जीवन क्या है ?
स्वप्न या सत्य ........?
जगत के सभी पंडितो ने, दार्शनिको ने ईस जीवन को, ईस संसार को अनित्य, क्षणभंगुर, माया, स्वप्न जैसा कहा है, और ईसे छोडकर शाश्वत जीवन की, अमरत्व की खोज मे चलने की बाते कही है !
संसार क्या है ?
मिल जाये तो मिट्टी, खो जाये तो सोना है ;
दुनिया ईसीको कहते है,ये जादुका खिलोना है ।
क्या सचमे ऐसा है ? यह सब माया है ? एक छलना है ?
हिन्दु पुराण कथामे एक Myth है, कि; महा शून्य के समुद्र मे अनन्त (काल) नाग की शैया पर योगनिद्रामे सोये हुए परमात्मा को आया हुआ स्वप्न है यह संसार....!
यह 'Myth' शब्द का अर्थ 'मान्यता' करते है पर यह 'मिथ' का अर्थ केवल मान्यता नही है, यह सत्य और कल्पना के बीच मे जो अंतराल है उसी को ईंगित करता है,वैसे तो कल्पना को भी 'असत्य' नही कहा जा सकता क्यों कि कल्पना तब ही हो सकती है, जब उसकी कही संभावना है, जो कही है ही नही उसकी कल्पना भी नही हो सकती है !
तो, ईश्वर को, अस्तित्वको आया हुआ स्वप्न है यह संसार.....।
और ईसीलीये यह संसार न तो सत्य है,न ही स्वप्न......
यह संसार न तो सत्य है, न ही स्वप्न, संसार सत्य ईसीलीये नही है कि यह एक स्वप्न है, औए संसार मिथ्या भी नही है, क्युं कि यह ईश्वर को आया हुआ स्वप्न है...!
और ईसीलीये आचार्य श्री शंकर ने कहा कि यह जगत यह संसार ब्रह्म का 'विवर्त' है, याने 'रिफ्लेक्शन' है, ब्रह्म की छाया है ईसीलीये ईसे माया कहते है ।
बह्म ने,अस्तित्व ने एक स्वप्न देखा कि, मै एक से अनेक हो जाउ...
एकोहम बहुस्यामि ।
और वह ईस अनन्त रुपों मे विस्तरित हो गया ।
मनुष्य भी अकेला नही रह सकता, वह भी अपने आस पास अपनी दूनिया, अपना संसाअर गढ लेता है । अपने संसार का सृजन करता है । तो ईस 'मिथ' का बहुत गहरे मे एक अर्थ यह भी है, कि हमारा संसार भी हमारे स्वप्नो का ही प्रतिबिंब है । ईच्छाओ और संकल्प का ही सृजन है ।
सिद्धसंकल्प ब्रह्म मे जो संकल्प उठा वह उमकी ईच्छाशक्ति से तत्क्षण ही साकार हो गया, उसी ब्रह्म के अंश होने के कारण वह संकल्पसिद्धि हम सब मै भी निहित है ।
और हमारे भीतर के गहन केन्द्र मे, हमारे अवचेतन मन मे जाने अनजाने मे जो भी संकल्प उठते है,वह हमारे जीवन मे साकार हो उठते है ।
ईसे ही 'कर्म' कहा जाता है, भाग्य कहा जाता है नियति कहा जाता है ।
कर्मणा गहनो गति । का अर्थ यह भी है । कर्म का अर्थ केवल हमारे स्थूल कर्म ही नही, जो हम शरीर और मन से निरंतर करते रहते है, किसीको गाली देते तो वापस मुक्का मिलता है ! पंडित लोग तो बहुत आगे की बाते बनाते है कि गत जन्म मे तुमने कोई भैस को डंडा मारा था तो ईसी जन्म मे भैस ने तुम्हे सींग मारे...???
यह तो बहुत छोटे-छोटे और उपरी सतह के कर्म है,यह बहुत प्रभाव नही डाल सकते, बहुत परिवर्तन नही ला सकते हमारे जीवन मे ।
हमारे जीवन को जो बदल सकते है, हमारी यात्रा को जो मोड दे सकते है यह कर्म तो हमारे भीतर हमारे गहरे अंतरतम मे बंधते और तुटते हमारे संकल्प है । हालांकि यह हमारी जानकारी के बाहर होता है, यह संकल्प अनजाने मे होते है,हमारे बाहरी मन मे जो ईच्छाये आकांक्षाये, अनुराग-घृणा, आसक्ति-विरक्ति, आग्रह-पूर्वग्रह, धारणा और मान्यताए पलती रहती है, वह धीरे धीरे द्रढ होती हुई भीतर अवचेतन मन मे उतरती रहती है और एक संकल्प का रुप ले लेती है, तब भीतर बैठा परमात्मा ईसे साकार कर देता है ....।
फिर हम बोल पडते है कि यह तो मैने नही मांगा था ! यह कैसा भाग्य है मेरा ?
अक्सर ऐसा भी होता है कि बहुत अरसे से भीतर कोई सपना पाल रक्खा है, और एक दिन अचानक वह साकार हो कर सामने आ जाता है, तो हम उसे पहेचान नही पाते है सपना तो वही है, पर समय ने उसका चेहरा बदल दिया है तो हम उसे पहेचान नही पाते, उसका स्वागत नही कर पाते और फिर शिकायते करते रहते है...।
फिर यह प्यास बनी रहती है, फिर यह दौड जारी रहती है ।
पर यह प्यास है, तो ही यह यात्रा है,और यात्रा ही तो जीवन है । प्यास बूझ गई तो यात्रा रुक गई, और यात्रा रुकी तो जीवन खतम !
पंडित लोग भले ही ईस रुकने को 'मुक्ती' कहे, मै नही कहेता....
मै तो ईसे मृत्यु कहता हू......।
प्रेम प्रणाम ।
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